पिंजरा और छाया
एक पिंजरा —
और एक छाया
खिले हुए गुलाब की।
सूर्योदय के बाद की
बस वही छाया आती है—
और चली जाती है।
मन का कोई कोना
उस गुलाब तक पहुँचना चाहता है;
वह सामने है,
फिर भी हाथों से बहुत दूर।
लोहे की सलाखें
खुशबू को रोक नहीं पातीं,
पर रास्ता
हर स्पर्श से पहले बंद कर देती हैं।
दिन ढलता है—
छाया दीवारों पर लंबी हो जाती है;
मन उसे सहलाता रहता है,
मानो वहीं सच बचा हो।
पिंजरे में कैद होना
मन ने ही चुना है।
लगता है, छाया जैसे ताना देती है—
कहती है:
पिंजरा तोड़ो
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