ख्वाब

 अब तो बो सपनों में आने लगे

हकीक़त की बातें जहां खत्म होती थीं

सपने में उनसे आगे जाने लगे।


यहां थी पहचान वहां जान जाने लगे

यहां के तकल्लुफ वहां इमोशंस जगाने लगे।

कल बातें हुई कि घर में कौन कौन है

मेरी तबियत ठीक नहीं थी तो लंच वो लाने लगे


एक मंजर आया कि कल नहीं मिल पाएंगे

इत्तिला होते ही उनके फोन आने लगे।

छुट्टी वाले दिन भी मिलने की खातिर

हर बार नए बहाने बनाने लगे।


शाम को देर हुई, तारे झिलमिलाए,

रास्ते सूने, ऑटो भी छुप जाने लगे।

कहे—डर लग रहा है इस बारिश में,

और हम साथ उनके, राह निभाने लगे।


फिर अचानक कुछ खामोशियाँ बढ़ने लगीं,

सपनों की दुनिया में दरारें पड़ने लगीं।

ख्वाब टूटे और वो, फिर अजनबी से लगने लगे।


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