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“रिंगटोन के उस पार”

  कहानी: “रिंगटोन के उस पार” दिल्ली की सर्दियों में उस साल कुछ अलग था। सिर्फ कोहरा नहीं छाया था — समय खुद धुंधला हो गया था। सिंघु बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन महीनों से चल रहा था। रात को टीवी खोलो तो ट्रैक्टरों की कतारें, दिन में खोलो तो बहस। धीरे-धीरे खबरें आने लगीं — लाल किले तक पहुँचने की तैयारी… देश जैसे हर तरफ से खिंच रहा था। उधर एक और अदृश्य भीड़ शहर में उतर आई थी — कोविड वायरस। सड़कें खाली थीं, पर अस्पताल भरे हुए। लॉकडाउन ने लाखों लोगों को घरों में कैद कर दिया था। जो घरों में नहीं थे — वे घर लौटने की कोशिश में सैकड़ों किलोमीटर पैदल थे। शेयर मार्केट, अजीब तरह से, आसमान छू रहा था। कंपनियाँ बंद हो रही थीं, पर ग्राफ ऊपर जा रहा था। OTT प्लेटफॉर्म ने सिनेमाघरों की लाइट बुझा दी थी। हर शाम लोग बालकनी में ताली बजाने से शुरू होकर रात को किसी दोस्त की मौत की खबर पर खत्म हो जाती। CAA-NRC के विरोध-प्रदर्शन अभी शांत भी नहीं हुए थे कि महामारी ने सबको अलग-अलग कमरों में बंद कर दिया। देश पहली बार एक साथ अकेला हो गया था। और उसी अकेलेपन में लोग पुराने नंबर ढूँढ रहे थे। फोन ...