याद
याद
कहाँ तक ले जाएगी —
साथ होने के मंज़र
एहसासों में उतर आने लगे।
कभी, कॉफ़ी की मेज़ पर
उनका हाथ सरककर
उँगली से मेरी छू जाता है।
उनकी उस हँसी का अंदाज़ —
एकटक मुझे थाम लेता है,
जैसे ओस की बूँद
गुलाब की पंखुड़ियों पर ठहर जाती हो।
उनके चेहरे पर
धीरे-धीरे ढलते आँसू —
पास बढ़ते हाथों को
कंपा देते हैं।
एहसासों का लंबा धागा
रुकते-रुकते फिर
ले जाता है उन बिखरे मोतियों तक,
जिन्हें उनकी एक मुस्कान
फिर से बिखरा देती है।
Comments
Post a Comment