उम्मीदें
जैसे सर्दी की धुंध के बीच
टिमटिम करता एक तारा,
रात की चादर ओढ़े बैठा
उम्मीदों का एक सहारा।
जैसे राख की परतों में दबी
एक नन्ही सी चिंगारी,
थकी रात के सीने में पलती
शोला बनने की तैयारी।
जैसे पतझड़ के बाद कहीं
दरख़्त पे बची हरी पत्ती,
सूनी शाख़ों के सन्नाटे में
ठिठकी ठंड में गाए बसंती।
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