अनकही

 काश कि मेरी आंखों को वो पढ़ पाते

भावों की भाषा से लिखी प्रेम की चिट्ठी

शब्द नहीं हैं मगर नर्म जज्बातों की,

लिखी इबारत को शायद वो पढ़ पाते।


कितना मुश्किल है ये सब कह देना

मुझे पता है काश कि उनको कह पाते

रूई के फाहे से भी कोमल आवाजें

घबराता हूँ घायल उनको कर जाएं।


कैसे जानूँ उनके मन की आहट को

इस बेचैनी का काश कि हल वो कर पाते

कब तक देखूंगा उनको यूं कतराता सा

काश कि अपनी इस हालत को कह पाते।

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